ICSE Class 10 Hindi • Sahitya Sagar (Stories) • Chapter 9
पाठ का परिचय (Introduction):
'भेड़ें और भेड़िए' हरिशंकर परसाई जी द्वारा रचित एक अत्यंत तीक्ष्ण और प्रसिद्ध प्रतीकात्मक व्यंग्य (Symbolic Satire) है। यह कहानी आधुनिक लोकतंत्र (Democracy) और चुनाव व्यवस्था पर गहरा कटाक्ष करती है। लेखक ने जानवरों के रूपक के माध्यम से यह समझाया है कि कैसे शोषक और भ्रष्ट नेता (भेड़िए), चालाक चाटुकारों (सियार) की मदद से भेष बदलकर, भोली-भाली और सीधी-सादी जनता (भेड़ों) को मूर्ख बनाकर उनके वोट हथिया लेते हैं और फिर उन्हीं का शोषण करते हैं।
यह कहानी पूरी तरह से प्रतीकों (Symbols) पर आधारित है। परीक्षा में इन प्रतीकों का अर्थ अवश्य पूछा जाता है:
एक बार वन प्रदेश (जंगल) के भेड़ों ने सोचा कि जंगल में लोकतंत्र (Panchayat/Elections) की स्थापना होनी चाहिए ताकि सभी जानवर शांति और प्रेम से रह सकें और कोई किसी को न मारे। जंगल में भेड़ों की संख्या बहुत अधिक थी (बहुमत), इसलिए यह तय था कि चुनाव में भेड़ें ही जीतेंगी और वे नियम बनाएँगी कि "कोई जानवर किसी को न खाए।"
यह सुनकर भेड़िए (जो भेड़ों को खाते थे) घबरा गए। उन्होंने सोचा कि यदि भेड़ें जीत गईं, तो उन्हें घास चरनी पड़ेगी या भूखों मरना पड़ेगा। एक बूढ़े और चालाक सियार ने एक उदास भेड़िए को देखा और उसकी परेशानी का कारण पूछा। सियार ने भेड़िए को आश्वासन दिया कि वह चुनाव में भेड़िए को ही जितवाकर दिखाएगा।
सियार ने एक योजना बनाई। उसने तीन अन्य सियारों को रंगा—एक को पीला, दूसरे को नीला, और तीसरे को हरा। इसके बाद उसने भेड़िए के गले में कंठी-माला डाल दी, माथे पर तिलक लगा दिया और उसे एक 'संत' (महात्मा) का रूप दे दिया।
सियार ने भेड़ों की सभा में संत रूपी भेड़िए को पेश किया। उसने भेड़ों से कहा कि "यह भेड़िया अब हिंसक नहीं रहा। यह संत बन गया है। इसमें हृदय परिवर्तन हो गया है और यह 100 दिनों से उपवास पर है।" पीले सियार (रंगे पत्रकार) ने भेड़िए की महानता की कविताएँ गाईं। नीले सियार (रंगे नेता) ने कहा कि ये सब प्राणियों की भलाई के लिए आए हैं। हरे सियार (धर्मगुरु) ने धर्म के नाम पर भेड़ों को भेड़िए को वोट देने के लिए उकसाया।
बूढ़े सियार ने भोली-भाली भेड़ों (जनता) को इस कदर मूर्ख बनाया कि भेड़ों ने सोचा, "अगर ऐसा महान संत भेड़िया हमारा राजा (नेता) बन गया, तो हमारा जीवन स्वर्ग हो जाएगा।" भेड़ों की आँखों पर सियार के झूठे प्रचार की पट्टी बँध गई।
चुनाव हुए और भोली भेड़ों ने भारी बहुमत से स्वार्थपरस्त और क्रूर भेड़ियों को अपना प्रतिनिधि (नेता) चुन लिया। पंचायत (सरकार) में भेड़ियों ने अपना पहला कानून पास किया: "सुबह नाश्ते में मुलायम भेड़ का बच्चा, दोपहर में पूरी भेड़ और रात में आधी भेड़ खाई जाए।"
इस प्रकार भोली-भाली जनता (भेड़ों) का शोषण उनके द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों (भेड़ियों) द्वारा ही कानूनी रूप से शुरू हो गया।
प्रसंग: यह वाकया तब का है जब सियार ने संत बने भेड़िए को भेड़ों की सभा में पेश किया था और भेड़ें उसके दर्शन करने आई थीं।
व्याख्या: यह पंक्ति यह सिद्ध करती है कि भेड़िए (क्रूर नेताओं) का चरित्र कभी नहीं बदलता। वे चाहे कितने भी संत या सेवक का नाटक (Acting) कर लें, उनके अंदर का स्वार्थ और क्रूरता (हिंसा) हमेशा जीवित रहती है। वे बस सही अवसर का इंतज़ार करते हैं।
प्रसंग: कहानी का अंतिम भाग, जब भेड़ें भेड़ियों को चुनाव जिता देती हैं और भेड़िए पंचायत (संसद/सरकार) में बैठते हैं।
व्याख्या: यह कहानी का सबसे तीखा प्रहार (Climax) है। जब शोषक (Exploiter) के हाथों में ही सत्ता (Power) आ जाती है, तो वह शोषण को ही 'कानून' (Law) का रूप दे देता है। भोली जनता जिस लोकतंत्र से अपने बचाव की आशा कर रही थी, उसी लोकतंत्र के नाम पर उनका सर्वनाश कानूनी रूप से शुरू हो जाता है।
प्रश्न 1: 'भेड़ें और भेड़िए' कहानी में नीले, पीले और हरे रंगे हुए सियारों के माध्यम से लेखक ने किन पर व्यंग्य किया है?
उत्तर: 'भेड़ें और भेड़िए' कहानी एक प्रतीकात्मक व्यंग्य है। इसमें रंगे हुए सियार समाज के उन ढोंगी और चाटुकार लोगों का प्रतीक हैं जो नेताओं (भेड़ियों) के लिए झूठा प्रचार करते हैं। पीला सियार उन कवियों, लेखकों और पत्रकारों (Media) का प्रतीक है जो पैसों के लिए भ्रष्ट नेताओं की झूठी तारीफ़ें लिखते हैं और उनका गुणगान करते हैं। नीला सियार उन झूठे और अवसरवादी नेताओं का प्रतीक है जो अपनी जाति या वर्ग को धोखा देते हैं। हरा सियार उन ढोंगी धर्मगुरुओं का प्रतीक है जो धर्म का भय दिखाकर जनता से भ्रष्ट नेताओं के पक्ष में वोट डलवाते हैं।
प्रश्न 2: वन-प्रदेश में लोकतंत्र की स्थापना की बात सुनकर भेड़ें क्यों खुश थीं और भेड़िए क्यों दुखी/घबराए हुए थे?
उत्तर: वन-प्रदेश में लोकतंत्र (पंचायत चुनाव) की स्थापना की बात सुनकर
भेड़ें इसलिए खुश थीं क्योंकि लोकतंत्र में बहुमत का शासन होता है। जंगल में भेड़ों की
संख्या बहुत अधिक थी। उन्हें लगा कि चुनाव में जीतने के बाद वे ऐसे कानून बनाएँगी कि कोई जानवर किसी को न
खाए, जिससे वे भेड़ियों के डर से मुक्त होकर शांति से जी सकेंगी।
दूसरी ओर, भेड़िए इसलिए घबराए हुए थे क्योंकि उनकी संख्या बहुत कम थी (अल्पमत)। उन्हें पता
था कि यदि भेड़ें चुनाव जीत गईं और उन्होंने 'एक-दूसरे को न खाने' का कानून बना दिया, तो भेड़ियों को या तो
घास चरनी पड़ेगी या भूखों मरना पड़ेगा। उनके शोषण का राज समाप्त हो जाएगा।
प्रश्न 3: बूढ़े सियार ने भेड़िए का रूप परिवर्तन (स्वँग) किस प्रकार किया?
उत्तर: बूढ़े सियार ने भोली भेड़ों को मूर्ख बनाने के लिए क्रूर भेड़िए को एक 'परम संत' और 'महात्मा' का रूप दे दिया। उसने भेड़िए के गले में माला (कंठी) डाल दी। माथे पर लंबा तिलक लगा दिया। उसके मुँह में कुछ तिनके (घास) फँसा दिए ताकि वह शाकाहारी लगे। सियार ने भेड़िए से कहा कि उसे भेड़ों के सामने आँखें ऊपर करके (आसमान की ओर देखकर) संत जैसा अभिनय करना है और किसी भी स्थिति में भेड़ों पर हमला नहीं करना है। इस प्रकार उसने क्रूर भेड़िए को एक अहिंसक और दयालु महात्मा के रूप में प्रस्तुत किया।